फर्जी दस्तावेज के सहारे लंबे समय से नौकरी कर रहा है एक अधिकारी, कार्यालय उप पंजीयक सहकारी संस्थाएं बेखबर

फर्जी दस्तावेज के सहारे लंबे समय से नौकरी कर रहा है एक अधिकारी, कार्यालय उप पंजीयक सहकारी संस्थाएं बेखबर 

न्यूज़ बिलासपुर बंधु (संतोष साहू)

बिलासपुर – न्यायधानी पर फर्जी प्रमाण पत्र के सहारे लंबे समय से एक अधिकारी कार्यालय उप पंजीयक सहकारी संस्थाएं बिलासपुर के अंतर्गत विभाग पर कार्यरत है।और  इन दिनों न्यायधानी में ही पदस्थ है। बताया जाता है कि वह अधिकारी सालों से  बिलासपुर जिला अंतर्गत एक ब्लॉक पर विस्तार खंड अधिकारी के पद पर कार्यरत है। उसके फर्जी दस्तावेज कि खबर संभवत विभाग के उच्च अधिकारियों को अब तक नहीं है।

गौरतलब है कि छत्तीसगढ़ प्रदेश में आदिवासियों को प्रदेश का मूल निवासी माना जाता है। साथ ही उन्हें आर्थिक व शैक्षणिक दृष्टि से कमजोर व पिछड़ा माना जाता रहा है।  इसीलिए उनकी आर्थिक व शैक्षणिक स्थिति में सुधार लाने के उद्देश्य से शासकीय नौकरियों पर उन्हें लाभ मिल सके इसलिए उन्हें आरक्षण के आधार पर खासा छूट शासन ने प्रदान किया है। ताकि वह आरक्षण का लाभ लेकर आसानी से नौकरी प्राप्त करें और अपनी आर्थिक  स्थिति में सुधार ला सके। लेकिन आरक्षण का लाभ वास्तविक में आदिवासियों को कितना प्राप्त हुआ है यह बता पाना थोड़ा मुश्किल है। वही कुछ लोग पिछड़ा वर्ग होते हुए भी फर्जी तरीके से अनुसूचित जनजाति का जाति प्रमाण पत्र बनवा  लेते हैं और उसका दुरुपयोग कर उस प्रमाण पत्र के सहारे आसानी से शासकीय नौकरियां प्राप्त कर लेते हैं। जिसका जीता जागता उदाहरण इन दिनों कार्यालय उप पंजीयक सहकारी संस्थाएं बिलासपुर पर कार्यरत एक अधिकारी को देखा जा सकता है

सूचना के अधिकार से प्राप्त दस्तावेज के अनुसार उक्त अधिकारी की प्रथम नियुक्ति उप अंकेक्षण के पद पर किया गया था। वह पिछले 31 सालों से विभाग पर कार्यरत है और पदोन्नति प्राप्त कर इन दिनों बिलासपुर जिला के एक ब्लॉक पर विस्तार खंड अधिकारी का दायित्व निभा रहे है। बताया जाता है कि सन 1982 में नायाब तहसीलदार बिलासपुर के समक्ष कूट रचित दस्तावेज प्रस्तुत कर उस अधिकारी ने अनुसूचित जनजाति का प्रमाण पत्र प्राप्त किया है। जबकि वह विस्तार खंड अधिकारी पिछड़ा वर्ग कि एक जाति के अंतर्गत आता है। लेकिन उसने कूट रचित दस्तावेज के सहारे फर्जी जाति प्रमाण पत्र बनाने में कामयाब हो गया। और वहां अनुसूचित जनजाति आरक्षण का लाभ लेकर लंबे समय से विभाग पर कार्यरत है जिसकी जानकारी संभवत विभाग के उच्च अधिकारियों को अब भी नहीं है। 

जबकि नियंता अनुसूचित जनजाति व अनुसूचित जाति का प्रमाण पत्र बनवाने के लिए जो राज्य शासन ने गाइडलाइन जारी किया है उसके हिसाब से पिछले लगभग 90 सालों का रिकॉर्ड मांगा जाता है। जिसमें कि पूर्वजों की वंशावली का मिलान किया जाता है। जिसके आधार पर आसानी से किसी भी व्यक्ति  की वास्तविक जाति का पता लगाया जा सकता है। अगर उक्त विस्तार खंड अधिकारी कि जाति का जांच उनके पूर्वजों के वंशावली का मिलान करके देखा जाए तो वह अधिकारी पिछड़ा वर्ग में आता है। और वह फर्जी तरीके से अनुसूचित जनजाति का प्रमाण पत्र बनवा कर आरक्षण का लाभ लेके लंबे समय से विभाग में नौकरी कर रहा है। जो कि नियंता गलत है विभाग को आवश्यकता है कि ऐसे फर्जी दस्तावेज के सहारे नौकरी करने वाले व्यक्ति के खिलाफ विभागीय कार्यवाही कर उनकी सेवा समाप्त करे। साथ ही फर्जी दस्तावेज बनवाने के कारण उनके खिलाफ संबंधित थाना में विभिन्न धाराओं के तहत अपराध पंजीबद्ध कराया जाए।

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